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Published pieces (3)
pre-written Ed. #46
दर्द-ए-ग़ज़ल
हम रात भर उनकी तारीफ करते रहे, उन्हें चौधवीं का चाँद कहते रहे, हम लफ़्ज़ों पे एहसास पिरोते रहे, कमज़र्फ़ उसे ग़ज़ल समझ कर सुनते रहे।...
pre-written Ed. #41
खबरों की 'मटर-पनीर'
सुबह-सुबह जब हाथ में आया, आज का ताज़ा अखबार, लगा कि जैसे परोसा गया, मटर-पनीर मसालेदार। नज़र जब डाला उसमें, अजब खेल यह देखा है, पनीर तो गायब है इसमें, म...
spot written Ed. #40
मेरी विरासत
विचार भी हमारे हमें विरासत में मिलते हैं रोजमर्रा की आदतों में पिरोए मिलते हैं शीश झुकाने को संस्कार कहते हैं सदियों से चलती आरही प्रथा कहते हैं बर्तन तो ...
