हम रात भर उनकी तारीफ करते रहे, उन्हें चौधवीं का चाँद कहते रहे, हम लफ़्ज़ों पे एहसास पिरोते रहे, कमज़र्फ़ उसे ग़ज़ल समझ कर सुनते रहे।