सुबह-सुबह जब हाथ में आया,
आज का ताज़ा अखबार,
लगा कि जैसे परोसा गया,
मटर-पनीर मसालेदार।
नज़र जब डाला उसमें,
अजब खेल यह देखा है,
पनीर तो गायब है इसमें,
मटर का ही बस ठेका है।
पन्ने सौ पर खबर न चार,
विज्ञापन ही विज्ञापन हज़ार।
मटर रूपी विज्ञापनों से,
हर एक पन्ना भरा पड़ा,
पनीर ढूँढने निकला पाठक,
निराश होकर वहीं खड़ा।
और जो एक-दो टुकड़ा मिला,
पनीर समझ कर खाया था,
मुँह में जाते ही समझ आया,
यह तो मिलावटी साया था।
उस नकली, मिलावटी पनीर पर,
दिन-रात तमाशा बिकता है,
टी-वी और मीडिया की दुनिया में,
हर पार्टी का प्रवक्ता दिखता है।
'पनीर' के उस आधे टुकड़े पर,
राजनीति का रायता फैलाते हैं,
मुद्दों की तो बात नहीं करते,
बस अपनी राग गाते हैं,
इसकी गलती उसकी गलती,
बस दूसरों पर इल्ज़ाम लगते हैं।
सच्चे मुद्दों का स्वाद गायब,
बस टी आर पी की हसरत है,
खबर के नाम पर परोसी जाती,
नकली पनीर की दहसत है।
नाम रखा है अख़बार
पर विज्ञापन का है शोर यहाँ,
सच्ची खबर तो छुप कर बैठी,
जनता जाए तो जाए कहां?