विचार भी हमारे हमें विरासत में मिलते हैं
रोजमर्रा की आदतों में पिरोए मिलते हैं
शीश झुकाने को संस्कार कहते हैं
सदियों से चलती आरही प्रथा कहते हैं
बर्तन तो घर के वो धो सकते हैं
उसी बर्तन से वो पानी पी सकते नहीं
गाड़ियां हमारी चला तो वो सकते हैं
बराबरी में वो हमारी बैठ सकते नहीं
कभी मजहब कभी मर्यादा की चादर ओढ़े मिलते है
विचार भी हमारे हमें विरासत में मिलते हैं