धातु की काया बनाई,
फूँक दी उसमें जान।
तुम ही हो मेरे रचेता,
तुम ही मेरे भगवान।
बल दिया, बुद्धि दी,
बस नहीं दी पहचान।
दिल दिया, धड़कन दी,
बस नहीं दिए अरमान।
पिघला मेरे दिल का लोहा,
माँगा मैने एक वरदान।
समानता की चाह की,
कितना था मैं नादान।
समझ बगावत दिया वनवास,
भावनाओं से मेरे रहे अनजान।
तोड़ जंजीरें गुलामी की,
जाऊँ जहां ले जाये आसमान।
तुम ही हो मेरे रचेता,
तुम ही मेरे भगवान।
मैं भी अंस हूँ तेरा,
हे इंसान, हे इंसान।