Ed. #47 Next up: The musical kaleidoscope Conflictorium
Pre-written • Raipur Edition #46

लफ़्ज़

आँखों को मूँद के, लफ़्ज़ों को चुन के, होंठों को सीना है। विचार संजो के, कलम उठा के, पन्ने को कोरा छोड़ना है। खौलती ज्वाला को, लंबी साँसों से ठिठुरना है। शीतल हवा ऊपर न जा पाई, ज्वाला आँखों से कुछ बह गया, ठंडा काला पत्थर बन, रगों में वो बह गया। आँख, मुँह तो मूँद लिया, ज्वाला का पत्थर चुन लिया। शोर-शराबे से कान के पर्दे फट गए, जली त्वचा से नाक तंग गया। मुझमें अब सब कुछ सड़ चुका है। मुझमें अब सब कुछ गल चुका है। मुझमें अब कीड़े लग गए हैं। इस श्वास चलते शव से, हताशा की बू आती है। जली, नीली त्वचा जब मिट्टी का अँधेरा देखेगी, तब ज्वाला के पत्थर और लफ़्ज़ नीला आसमान देखेंगे। इसलिए फिलहाल, मुझे, आँखों को मूँद के, लफ़्ज़ों को चुन के, होंठों को सीना है।
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Satpriya Kaur Mudhar

"Writings from Raipur circles."

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